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सांस्कृतिक पत्रकारिता में सर्जनात्मकता

डी. ए. वी.  कॉलेज, जालन्धर के हिन्दी-विभाग की ओर से "सांस्कृतिक पत्रकारिता में सर्जनात्मकता" विषय पर एक-दिवसीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया| कॉलेज की "प्रेमचन्द हिन्दी साहित्य परिषद्" द्वारा संयोजित इस आयोजन में सुप्रसिद्ध गद्यकार एवं फीचर सम्पादक डॉ. अजय शर्मा मुख्य-अतिथि के रूप में सम्मिलित हुए |

संगोष्ठी में उपस्थित मुख्य-अतिथि व स्रोत-वक्ताओं का स्वागत करते हुए डी. ए. वी. कॉलेज के प्रिंसीपल डॉ. संजीव कुमार अरोड़ा ने कहा कि हमारे कॉलेज का हिन्दी-विभाग देशभर में विख्यात है| इस विभाग ने हिन्दी साहित्य को उपेन्द्रनाथ अश्क, मोहन राकेश, रवीन्द्र कालिया जैसे कई क्रिएटिव व्यक्तित्व दिए हैं| आज छात्रों में मौजूद इस क्रिएटिवटी को सही दिशा देने की बहुत ज़रूरत है |
हिन्दी विभाग की अध्यक्ष, प्रो. सन्दीपना शर्मा ने औपचारिक रूप से मुख्य-अतिथि डॉ. अजय शर्मा, स्रोत-वक्ता शाहिद हसन शाहिद और इंजी. सलीम अंसारी का स्वागत करते हुए अपने सम्बोधन में कहा कि हमें पूरा विश्वास है कि आज की संगोष्ठी में पधारे विद्वानों को सुनकर हमारे विद्यार्थी अवश्य लाभान्वित होंगे| इस मौक़े पर उन्होंने स्रोत-वक्ता शाहिद हसन शाहिद और इंजी. सलीम अंसारी का स्वागत पुष्प-गुच्छ व सम्मान-चिह्न देकर किया|
मुख्य-अतिथि डॉ अजय शर्मा के अनुसार सांस्कृतिक पत्रकार के पास यदि दृष्टि हो, तो वह अपने पेशे में ख़ूब शोहरत हासिल कर सकता है| भारतीय संस्कृति पश्चिम की संस्कृति की तुलना में मानव-मूल्यों से अधिक जुड़ी है| वर्तमान में हिन्दी पत्रकारों को बहुत-सी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है| अब सांस्कृतिक पत्रकारिता में भी कॉर्पोरेट घरानों का दख़ल बढ़ गया है| परिणामस्वरूप पत्रकार वेतनभोगी बनकर रह गए हैं| इसके बावजूद कुछ स्वतंत्र दृष्टि-सम्पन्न पत्रकार अपनी सृजनशीलता के बल पर अपनी पहचान भी बनाते हैं| वे जो बात मीडिया में नहीं कह पाते, उसने लिए अपनी सृजनात्मकता को हथियार बनाकर पुस्तक जैसे प्रिंट माध्यम या अन्य इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों से अपनी अभिव्यक्ति को साकार कर रहे हैं|
इससे पूर्व संगोष्ठी का विषय प्रस्तावित करते हुए हिन्दी विभाग के प्राध्यापक डॉ. बलवेन्द्र सिंह ने कहा कि सांस्कृतिक पत्रकारिता के व्यापक क्षेत्र में हमारे आस्था-विश्वास, तीज-त्यौहार, मेले-ठेले, भाषा-साहित्य, कला-संस्कृति आदि समाहित होते हैं| 'सर्जनात्मकता' वर्तमान जीवन-सरोकारों से प्रभावित होते हुए सांस्कृतिक पत्रकारिता में नित-नई सम्भावनाओं को तलाश रही है|
संगोष्ठी में बोलते हुए प्रेस इन्फॉर्मेशन ब्यूरो (भारत सरकार) में अपनी सेवाएं दे चुके मीडिया विशेषज्ञ शाहिद हसन शाहिद ने कहा कि आज के दौर में भारतीय भाषाएँ एक तरह से मर रही हैं| कॉर्पोरेट के बाद अब सरकार मीडिया की मॉनिटिरिंग कर रही है| वही समाचार पत्रों और मीडिया को एजेंडा दे रही है और बुद्धिजीवी उसमें घिरे जा रहे हैं| ऐसे में क्रिएटिव पत्रकार ही अपने विचार को लेगों तक पहुंचा पाने में सफल हो रहे हैं|
इस अवसर पर डॉ. अजय शर्मा ने संगोष्ठी में उपस्थित विद्यार्थियों द्वारा उठाए गए प्रश्नों का उत्तर दिया| इसके पश्चात्  संगोष्ठी के अन्य स्रोत-वक्ता इंजी. सलीम अंसारी ने कहा कि पत्रकारिता और उससे बाहर जीवन में भी क्रिएटिविटी का बहुत महत्व है| एक तरह से यह हमारी ख़ुराक बनकर हमारी बैद्धिक भूख को शान्त करती है| अपनी कविताओं के माध्यम से इंजी. सलीम अंसारी ने कहा कि ---
"तुम्हारे शहर का किरदार बेच सकते हैं,
 हमारे  शहर के  अख़बार बेचने वाले |"
और
"दोस्त अपना यक़ीन चाहते हैं,
 साँप हैं,  आस्तीन  चाहते  हैं |"
 
संगोष्ठी में उपस्थित डी. ए. वी. कॉलेज, जगराओं के प्रिंसीपल डॉ. कर्ण शर्मा ने इस सम्बन्ध में कहा कि हिन्दी-विभाग द्वारा आयोजित संगोष्ठी का विषय बहुत आकर्षक और उपयोगितापूर्ण है| मानव-मूल्य ही सांस्कृतिक पत्रकारिता का आधार होने चाहिए| वास्तविक सांस्कृतिक पत्रकारिता जीवन के प्रति निष्ठा पैदा करती है|
"प्रेमचन्द हिन्दी साहित्य परिषद्" द्वारा संयोजित इस संगोष्ठी में रामगढ़िया कॉलेज ऑफ एजूकेशन (फगवाड़ा) से प्रो. रमण शर्मा, हिन्दी विभाग की प्राध्यापिका डॉ. मीनू तलवाड़, संस्कृत विभाग की अध्यक्ष डॉ. जीवन आशा, प्रो. ऋतु तलवाड़, प्रो. टीना वैद्य के अतिरिक्त कॉलेज के डीन पब्लिक रिलेशंस प्रो. मनीष खन्ना और हिन्दी, संस्कृत व जनसंचार विभाग के विद्यार्थियों ने सहभागिता की|
एक-दिवसीय संगोष्ठी के संयोजक डॉ. बलवेन्द्र सिंह ने सफल मंच-संचालन किया|